(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 13 अनुशासनपर्व


॥ श्रीः ॥
13.122. अध्यायः 122
अथ दानधर्मपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Topics
फेनपस्य गोभक्तयुद्रेकसन्तुष्टाभिर्गोलोकादागतगोमातृभिः योगप्रभावेण शरीराद्वियोजनेन स्वलोकप्रापणपूर्वकं तस्मिन्कपिलानिश्चयनिवेदनम्॥ 1 ॥ ततः कपिलाभिर्यथाप्रतिज्ञं शृङ्गाघातादिना फेनपस्य कुणपशरीरविभेदनम्॥ 2 ॥


Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Text

`भीष्म उवाच।

यास्तु गोमातरस्तस्य कामचारिण्य आगताः।
समीपं हि सुमित्रस्य कृतज्ञाः समुपस्थिताः॥ 13-122-1(86154)
अभिप्रशस्य चैवाहुस्तमृषिं पुण्यदर्शनाः।
गोलोकादागता वेद वृषगोमातरो वयम्॥ 13-122-2(86155)
सुप्रीताः स्म वरं गृह्ण यमिच्छसि महामुने।
यद्भि गोषु परां बुद्धिं कृतवानसि नित्यदा॥ 13-122-3(86156)
सुमित्र उवाच। 13-122-4x(7144)
प्रीतोस्म्यनुगृहीतोस्मि यन्मां गोमातरः शुभाः।
सुप्रीतमनसः सर्वास्तिष्ठन्ते च वरप्रदाः॥ 13-122-4(86157)
भवेद्गोष्वेव मे भक्तिर्यथैवाद्य तथा सदा।
गोघ्नाश्चैवावसीदन्तु नरा ब्रह्मद्विषश्च ये॥ 13-122-5(86158)
गोमातर ऊचुः। 13-122-6x(7145)
एवमेतदृषिश्रेष्ठ हितं वदसि नः प्रियम्।
एहि गच्छ सहाऽस्माभिर्गोलोकमृषिसत्तम॥ 13-122-6(86159)
सुमित्र उवाच। 13-122-7x(7146)
यूयमिष्टां गतिं यान्तु न ह्यहं गन्तुमुत्सहे।
इमा गावः समुत्सृज्य तपस्विन्यो मम प्रियाः॥ 13-122-7(86160)
भीष्म उवाच। 13-122-8x(7147)
तास्तु तस्य वचः श्रुत्वा कपिलानां सुदारुणम्।
नित्युस्तमृषिमुत्क्षिप्य भार्गवं नभ उद्वहन्॥ 13-122-8(86161)
कलेवरं तु तत्रैव तस्य संन्यस्य मातरः।
निष्कृष्य करणं योगादानयन्भार्गवस्य वै॥ 13-122-9(86162)
सर्वं चास्य तदाचख्युः कपिलानां विचेष्टितम्।
यदर्थं हरणं गोभिर्गोलोकं लोकमातरः॥ 13-122-10(86163)
ततस्तु कपिलास्तत्र तस्य दृष्ट्वा कलेवरम्।
तथाप्रतिज्ञं शृङ्गैश्च खुरैश्चाप्यवचूर्णयन्॥ 13-122-11(86164)
ततः संछिद्य बहुधा भार्गवं नृपसत्तम।
युयुर्यत्रेतरा गावस्तच्च सर्वं न्यवेदयन्॥ 13-122-12(86165)
अथ गोमातृभिः शप्तास्ता गावः पृथिवीचराः।
अमेध्यवदनाः क्षिप्रं भवध्वं ब्रह्मघातकाः॥ 13-122-13(86166)
एवं कृतज्ञा गावो हि यता गोमातरो नृप।
ऋषिश्च प्राप्तवाँल्लोकं गावश्च परिमोक्षिताः॥' ॥ 13-122-14(86167)

इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ 122 ॥

Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Footnotes

7-122-2 वेद विद्धि। ऋषे गोमातरो वयमिति थ.पाठः॥ 7-122-8 कपिलानां सुदारुणं सुमित्रवधप्रतिज्ञानं च श्रुत्वा॥


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